14 वीं शताब्दी का संकट
- Anupam Dixit
- Sep 4, 2020
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पंद्रहवीं शताब्दी आते आते यूरोप का क्लाइमेट फिर ठंडा होने लगा था और इसके साथ ही समुद्री सैलाब, तूफान और बारिश ने समुद्री तट के एरिया में फ़ार्मिंग की ज़मीनें खत्म कर दीं और ऊंची पहाड़ियाँ खेती के लिए बेहद ठंडी हो गईं । तटीय बंदरगाह जहां से पानी के जहाज दूर तक व्यापार के लिए जाया करते थे वे नष्ट होने लगे और इनके मालिक या लॉर्डों के पास इनकी मरम्मत के लिए ना तो पैसे थे और ना ही समय।
बढ़ती ठंड की वजह से जंगल बढ़ गए और खेती की जमीन कम होने लगी। ठंड की वजह से ही फसलों के मौसम छोटे होते गए और पैदावार कम होती गई। पिछले 300 वर्षों से अच्छे मौसम, बढ़ती पैदावार और शहरों के विकास ने यूरोप कि जनसंख्या बढ़ा दी थी । यही जनसंख्या अब अनाज की कमी , बेरोजगारी और महंगाई ने परेशान थी ।
उधर ऑस्ट्रिया की चांदी की खानें बंद पड़ गईं जिसने मौद्रिक धातु यानि बुलियन मैटल्स की कमी पैदा कर दी । व्यापार के रुकने और घटती पैदावार ने लोगों की आमदनी पर असर डाला जिसका सीधा परिणाम यह हुआ कि मौद्रिक व्यवस्था या मॉनीटरी सिस्टम मंद पड़ने लगा ।
निरंतर कम होती पैदावार , घटते टैक्स और मंद पड़े व्यापार ने सामंती लॉर्डों की आमदनी कम कर दी । अपनी आमदनी को बचाने के लिए टैक्स की वसूली में सख्ती की गई।
इसी समय व्यापारिक जहाजों में साथ आए चूहों के साथ ही पश्चिमी यूरोप में “प्लेग” फैल गया । इसे “ब्लैक डेथ” कहते थे क्यूंकी मरने वाले का शरीर काला पड़ जाता था । इस महामारी ने यूरोप कि 40% जनसंख्या को खत्म कर दिया । इससे कामगारों कि संख्या में कमी आई और मजदूरी बढ़ गई ।
पिछले 300 वर्षों में मौद्रिक व्यवस्था के पनपने की वजह से इन लॉर्डों ने अपने कृषकों से एक एग्रीमेंट के तहत टैक्स नकद रूप में (cash) में मांगा था। अब फिर से लॉर्ड पुरानी तरह से किसानों से चाहते थे कि वे बंधुआ होकर खेती करने लगें और लॉर्ड के मैनर में बेगार या फोर्स्ड लेबर करने पर राजी हो जाएँ । लेकिन किसानों को अब पुरानी व्यवस्था नहीं पसंद थी । वे या तो शहरों में भाग गए जहां उन्हें अधिक मजदूरी मिल सकती थी या उन्होंने लॉर्डों के विरुद्ध हथियार उठाने शुरू कर दिए । 1323 में फलैन्डर्स , 1358 में फ्रांस और 1381 में इंग्लैंड के किसानों ने विद्रोह किए ।



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